यौवन ---भिगा भिगा

यौवन ---भिगा भिगा


यौवन --कुछ भिगा भिगा
बारिश का मौसम बडा सुंदर सुहाना लगता है ..मन को भाता है ,लुभाता हैं ...
श्यामवर्ण आकाश में
अभि अभि तो बुंद बुंद आस्मा से बरसं रहें.....
बस जी चाह रहा है बारिश में घुम आये।
तुम तो जानते हो मैं कितनी घुमक्कड़ हु। ...
जी चाहे वहाँ निकल जाती हु। ..
न मुझे संग चाहिए न साथ चाहिए। ..
मै तो मनमौजी हु ,खुब खुब घूमती हु। ..
मैं भी उस दिन घुमने निकली बारिश मै। ..
बुंद बुंद बारिश का मेरे साथ था। ..
मुझे भिगोये हुए ,बारिश भी मजा ले रा था। .
बस कही घुमने का मन था ,
और थोड़ी बारिश में भीगने का। ..
तुम्हारा जरा ख्याल आया। ...
मन दौड़ने लगा बेलगाम सा। ...
अब जाऊ या तब जाऊ
मैंने कुछ न सोचा, न मेरे मन ने
बस पहुँच गयी तुम्हारे द्वार धडाम से। ...
तुम देखते रह गए ,मुझे
भीगी भीगी सी अंग अंग में। ..
मै भी अंजान नवयौवना। ..
यौवन कही .. युं छु जाता था
भिगी बहकी तुम्हारी आँखे।
कंप कंप सा देह तुम्हारा। ..
कण कण देह कहीं तरस रहा था। ..
मै भिगी भिगी बारिश में। ...
तुम जो भिगे भिगे मुझमें । ...
कुछ सुध बुध न रही।
खुद मैं खो गयी कही । ..
गुमसुम गुमसुम मै खड़ी। ..
तुमने भर लिया जो बाहो में। ..
मैं भी भीगी गुमसुम सी। ..
झुमती रही आगोश में। .
रस्मे उसुल यौवन के। ..
कहाँ बाँधे रख दिए। ..
मेरे यौवन का एक ही उसुल।
यौवन के द्वार पार कर। ...
भीगे भीगे हम जश्न मनाएं। ..
रचियता ---अड़ अर्चना गोन्नाड़े
aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa
मैं


















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